गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥
देवी अहिल्या का नाम वैदिक भारत की असीम सुंदरियों में लिया जाता है। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मदेव की मानस पुत्री अहिल्या को उनके पति गौतम महर्षि ने जड़ हो जाने का श्राप दे दिया था। अपने पति के श्राप के कारण वर्षों तक अहिल्या एक पत्थर की मूर्ति बनकर रहीं और अंततः त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने अपने स्पर्श से उनका उद्धार किया। क्यों दिया गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी को पत्थर बन जाने का श्राप? सुनिए रामायण के पन्नों से देवी अहिल्या की यह कथा। रामायण में यह कथा ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम और लक्ष्मण जी को सुनाई थी।
ब्रह्मा की मानस पुत्री अहिल्या की सुंदरता असीमित थी। रूप और गुण में कोई भी स्त्री उनके समान नहीं थी। ब्रह्मदेव के आशीर्वाद से देवी अहिल्या का विवाह महर्षि गौतम के साथ हुआ और दोनों मिथिला नगरी के समीप आश्रम में रहने लगे।
एक बार देवराज इन्द्र गौतम आश्रम के पास से निकल रहे थे कि उनकी दृष्टि सुंदरी अहिल्या पर पड़ी। देवी अहिल्या की सुंदरता देखकर इन्द्र अपनी वासना पर नियंत्रण नहीं रख सके और उन्होंने किसी प्रकार अहिल्या को पाने के सोची।
एक दिन इन्द्र ने प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त के पहले ही एक मुर्गे की आवाज निकालकर गौतम ऋषि को भ्रमित कर दिया। महर्षि को लगा कि ब्रह्म-मुहूर्त हो गया है और वो नदी में स्नान के लिए निकल गए।
अहिल्या आश्रम में अकेली थी। देवराज इन्द्र, जो कि ऐसे ही अवसर की ताक में थे, गौतम ऋषि का वेश धारण कर आश्रम पहुँच गए। पहले तो देवी अहिल्या को लगा की उनके पति ही स्नान कर वापस लौट आए हैं और उन्होंने गौतम ऋषि के वेश में इन्द्र को अपने पास आने से नहीं रोका।
दोनों काम वासना से भरे हुए एक-दूसरे के समीप आना चाह रहे थे। ऐसा कामुक व्यवहार गौतम ऋषि से अपेक्षित नहीं था, इसीलिए अहिल्या को संदेह हुआ कि यह उनके पति के रूप में कोई और ही है; परंतु अपनी कामुकता के मद में अहिल्या ने इन्द्र को नहीं रोक और उनके साथ संभोग किया।